मानसिक उलझनों का निदान
(श्रीमद् भागवत महापुराण में वर्णित)
भविष्य की चिंता
डॉ. आभा गुप्ता

“चिंता होती है चिता समानजो काल बनकर पहुँचा देती श्मशान”
— डॉ. आभा गुप्ता की स्वरचित पंक्तियाँ
हमारी यही सबसे बड़ी विडंबना है कि हम भविष्य की चिंता में अपने वर्तमान को बर्बाद कर देते हैं। वास्तव में हमारा वर्तमान उस नींव के पत्थर की तरह होता है जिस पर उज्ज्वल भविष्य की इमारत टिकी होती है।
समय किसी के लिए भी रुकता नहीं है। अतः वर्तमान को सुदृढ़ बनाने से भविष्य अपने आप सँवर जाएगा।
हमारी संस्कृति हमारे सद्विचारों की वाहिका है और यह जागृत अपने संचित पुण्य कर्मों से ही होती है। हमारा आध्यात्मिक दृष्टिकोण हमें संस्कारित कर सही पथ-प्रदर्शन करता है।
आज की भागती हुई जिंदगी में सबको आसानी से सब कुछ चाहिए। इस कारण अपनी क्षमता और रुचि के विरुद्ध बस एक-दूसरे से मुकाबले की होड़ में केवल सब भाग रहे हैं और असफल होने पर अपने भाग्य को कोस रहे हैं। आपका उचित कर्म ही आपके भाग्य का फैसला करता है।
ईश्वर ने सबको विशेष बनाया है। अतः दूसरों की सफलता पर ईर्ष्या करने के बजाय अपने आप को पहचानना आवश्यक है। अपने भीतर आत्मविश्वास भरने की आवश्यकता है। यह आत्मबल हमें अपने धार्मिक ग्रंथों से प्राप्त हो सकता है। इसका मतलब धार्मिक अनुष्ठानों से कदापि नहीं है, अपितु आध्यात्मिक ज्ञान से है।
अब मन में यह सवाल उठता है कि आखिर आध्यात्मिक ज्ञान कैसे प्राप्त होगा? क्योंकि आज के दौर में, जहाँ जिंदगी सोशल मीडिया की गुलाम हो गई है, वहाँ किसी के पास भी अपने ग्रंथों को जानने का या पढ़ने का समय ही नहीं है। तो फिर क्या करें?
इसका सरल और आसान उत्तर यही है कि आपको कुछ भी विशेष करने की आवश्यकता नहीं है। बस जिंदगी को समझने की दृष्टि नहीं, दृष्टिकोण बदलिए। सकारात्मक सोच से वर्तमान को बेहतर बनाइए, भविष्य अपने आप सुरक्षित हो जाएगा।
दृष्टि और दृष्टिकोण को समझने के लिए श्रीमद् भागवत महापुराण के ध्रुव चरित से समझा जा सकता है। पिता की गोद में बैठने से वंचित ध्रुव की माता सुनीति ने पाँच वर्ष के बालक को यह शिक्षा कदापि नहीं दी कि पुत्र, पिता की गोद में बैठना तुम्हारा अधिकार है, उससे तुम्हें कोई वंचित नहीं कर सकता।
इस प्रकार की सोच हम सबकी दृष्टि से सही है, लेकिन माता सुनीति के आध्यात्मिक दृष्टिकोण को समझिए। माता ने पुत्र से कहा—बेटा! ये तो तुम्हें जन्म देने वाले पिता हैं। तुम्हें तो उनकी गोद में बैठना चाहिए जो जगत-पिता श्री हरि विष्णु हैं।
कहने का तात्पर्य यह है कि परिस्थितिवश जीवन में कोई भी समस्या आए, तो बिना विचलित हुए उसका समाधान अवश्य खोजना चाहिए। आपको हल अवश्य मिलेगा।
कथा / श्लोक संदर्भ
ध्रुव चरित — चतुर्थ स्कंध
आगे क्या करें
यह प्रसंग पुस्तक “श्रीमद्भागवत कथा — समग्र अनुशीलन” में विस्तार से पढ़ा जा सकता है। किसी प्रश्न पर सीधे बात करना चाहें तो व्हाट्सएप करें।