मानसिक उलझनों का निदान
(श्रीमद् भागवत महापुराण में वर्णित)
असफलता का डर / आत्मविश्वास की कमी
डॉ. आभा गुप्ता

“बुलंद हौसले सफलता के पैग़ाम हैं लातीमुश्किल घड़ी में भी मन में आत्मविश्वास है जगाती”
— डॉ. आभा गुप्ता की स्वरचित पंक्तियाँ
संघर्ष मंजिल तक पहुँचने की पहली सीढ़ी है। असफलता में भी सफलता शब्द अंतर्निहित है। सिक्के के दो पहलू की तरह ही हालात भी बदलते रहते हैं। हार और जीत के इस द्वंद्व का प्रभाव हमारे मनोमस्तिष्क पर पड़ता है।
आज सबकी जिंदगी कुछ पाने और कुछ खोने में ही उलझकर रह गई है। आप जिस भी कार्यक्षेत्र में हैं, बस किसी से आगे बढ़ने की होड़ में बिना सोचे-समझे भाग रहे हैं। इस कारण आपको असफलता का सामना करना पड़ता है। बुद्धिमानी इस बात में है कि आप अपनी क्षमता को समझें और दूसरों से अपनी तुलना करना बंद करें।
खरगोश और कछुए की दौड़ में जीत कछुए की होती है। अतः धैर्य रखना ही सफलता की कुंजी होती है।
हम सबको प्रभु ने अमूल्य मानव जीवन जीने के लिए दिया है। अर्थात् ईश्वर ने जो कुछ भी दिया है, वह केवल शरीर मात्र नहीं है, अपितु असीमित शक्तियों का विपुल भंडार भी है। पर हम इन सबसे अनभिज्ञ हैं। जिसने भी इसे जान लिया, वह विशेष बन गया। कहने का तात्पर्य यह है कि मनुष्य को अपने आत्मविश्वास को स्वयं ही प्रबल करना होगा, तभी वह सफल हो पाएगा।
श्रीमद् भागवत महापुराण कैसे हमारा मार्गदर्शन करता है, यह जानने की आवश्यकता है। श्रीमद् भागवत में अनेक ऐसे प्रसंग हैं, जिनके बारे में जानकर हमारा आत्मविश्वास सुदृढ़ होता है। उदाहरण के लिए हम पुराण के दशम स्कंध के पच्चीसवें अध्याय में वर्णित गोवर्धन लीला से समझ सकते हैं।
सारे ब्रजवासी धन-धान्य और सुख-समृद्धि के लिए इंद्रदेव की उपासना करते थे। प्रभु श्रीकृष्ण ने इसका विरोध किया और कहा—हमें पूजा उनकी करनी चाहिए, जो हमारे जीवन को सुख प्रदान करते हैं। हमें गोवर्धन पर्वत की पूजा करनी चाहिए, क्योंकि वही हमारी आवश्यकताओं की पूर्ति करता है।
प्रभु की बातों से प्रभावित होकर ब्रजवासियों ने यही किया और उसके परिणामस्वरूप इंद्रदेव के क्रोध का सामना भी करना पड़ा। यह कथा हम सब जानते हैं।
यहाँ समझने वाली बात यह है कि यह सबका नन्हे बालक श्रीकृष्ण के प्रति आत्मविश्वास ही था, जिसके कारण उन्होंने इंद्रदेव से अपनी लड़ाई लड़ी और सफल हुए। कहने का तात्पर्य यह है कि मुसीबत लाख बड़ी हो, परिणाम की चिंता किए बिना संघर्ष अवश्य करना चाहिए।
अब मन में तो बात आएगी ही कि वहाँ तो प्रभु थे, इस कारण सफलता प्राप्त हुई। पर हम लोग यह क्यों भूल जाते हैं कि हमारे पास भी प्रभु द्वारा प्राप्त आत्मबल है, जिसे धैर्यपूर्वक इस्तेमाल करने की आवश्यकता है?
अगर आपको असफलताओं का सामना लगातार करना पड़ रहा है, तब भी अपने को कभी छोटा और नाकाम मत समझिए। ऐसा करने से पहले, यदि आप असीम शक्ति पर विश्वास करते हैं, तो एक बार ज़रूर सोचिएगा कि मैं अपने को छोटा समझकर किसे छोटा और नकारा समझ रहा हूँ? क्या उस सुपर पावर की क्षमता को कम समझ रहा हूँ, जो हम सबके भीतर विद्यमान है?
ऐसा सोचते ही आप में नई ऊर्जा का संचार होगा और आपके विचार पॉजिटिव हो जाएँगे। एक आवाज़ भीतर से ज़रूर आएगी कि मैं भी विशेष और अनमोल हूँ। मेरी मंजिल कुछ और है और मैं प्रयास कुछ और पाने का कर रहा हूँ, इस कारण सफल नहीं हो पा रहा हूँ।
जीवन को सहज बनाने के लिए धर्म की गहराइयों को समझना ज़रूरी है।
कथा / श्लोक संदर्भ
गोवर्धन लीला — दशम स्कंध, अध्याय 25 (लेखिका द्वारा दिया गया संदर्भ)
आगे क्या करें
यह प्रसंग पुस्तक “श्रीमद्भागवत कथा — समग्र अनुशीलन” में विस्तार से पढ़ा जा सकता है। किसी प्रश्न पर सीधे बात करना चाहें तो व्हाट्सएप करें।